संत बनो। सिपाही बनो


यह कहानी एक सच्चे सिख योद्धा चरन सिंह की है, जो गुरु गोबिंद सिंह जी का शिष्य था। जब अत्याचारियों ने गाँव पर हमला किया, तब चरन सिंह ने तलवार उठाई — लेकिन नफरत से नहीं, न्याय के लिए। वह दिन में पाठ करता, सेवा करता और जरूरत पड़ने पर तलवार से बेगुनाहों की रक्षा करता। युद्ध में उसने दुश्मनों को हराया, लेकिन जब एक घायल दुश्मन माफ़ी माँगता है, तो वह उसे जीवनदान देता है। यह कहानी सिख धर्म के उस आदर्श को दर्शाती है — "संत भी बनो, सिपाही भी।" यानी दयालु भी बनो, और निडर भी।

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